रायपुर : बस्तर पंडुम में राष्ट्रपति ने देखा जनजातीय संस्कृति का अद्भुत संसार ,बस्तर की माटी, कला और विरासत से रूबरू हुईं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु


रायपुर, 7 फरवरी 2026/ बस्तर पंडुम के शुभारंभ अवसर पर राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने जनजातीय परंपराओं, आदिम संस्कृति और बस्तर की विशिष्ट कला को समर्पित भव्य प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस दौरान उन्होंने विभिन्न स्टॉलों का भ्रमण कर स्थानीय कारीगरों, शिल्पकारों और कलाकारों से संवाद किया तथा प्रदर्शित कलाओं और उत्पादों की जानकारी प्राप्त की।

राष्ट्रपति ने बस्तर पंडुम को जनजातीय विरासत के संरक्षण और उसके वैश्विक प्रचार का प्रभावी मंच बताते हुए आयोजन की सराहना की। प्रदर्शनी में ढोकरा हस्तशिल्प, टेराकोटा, वुड कार्विंग, सीसल कला, बांस शिल्प, लौह शिल्प, जनजातीय वेश-भूषा एवं आभूषण, तुम्बा कला, जनजातीय चित्रकला, पारंपरिक व्यंजन तथा लोकचित्रों का आकर्षक प्रदर्शन किया गया।

जनजातीय हस्तशिल्प प्रदर्शनी में ढोकरा कला से निर्मित वस्तुएं विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। लॉस्ट वैक्स कास्टिंग तकनीक से तैयार यह प्राचीन धातु कला प्रकृति, देवी-देवताओं और ग्रामीण जीवन को अभिव्यक्त करती है। प्रत्येक ढोकरा कृति पूर्णतः हस्तनिर्मित होती है, जिसमें समाड़ी मिट्टी, मोम, तार, पीतल और पारंपरिक भट्टी का उपयोग किया जाता है। इसके साथ ही टेराकोटा कला के अंतर्गत मिट्टी से बनी आकृतियों ने लोक आस्था और ग्रामीण जीवन की सजीव झलक प्रस्तुत की।

लकड़ी की नक्काशी कला के स्टॉल में सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं पर आधारित मूर्तियां प्रदर्शित की गईं, जिनके निर्माण में सागौन, बीजा, सिवनर और साल लकड़ी का उपयोग किया गया है। सीसल कला से बने जूट वस्त्र और हस्तशिल्पों ने भी राष्ट्रपति का ध्यान आकर्षित किया। बांस से निर्मित उपयोगी एवं सजावटी वस्तुएं तथा गढ़े हुए लोहे से बनी कलाकृतियां जनजातीय शिल्प कौशल की उत्कृष्ट मिसाल रहीं।

जनजातीय आभूषणों के स्टॉल में चांदी, मोती, शंख और विभिन्न धातुओं से हाथ से बनाए गए आभूषण प्रदर्शित किए गए, जो आदिवासी समाज की पहचान और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतीक हैं। तुम्बा कला के अंतर्गत सूखी लौकी से बने पारंपरिक वाद्य यंत्र और सजावटी वस्तुएं भी प्रदर्शनी में शामिल रहीं।

जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण स्टॉल में बस्तर क्षेत्र की प्रमुख जनजातियां— दंडामी माढ़िया, अबूझमाड़िया, मुरिया, भतरा और हल्बा — की पारंपरिक वेशभूषा एवं आभूषणों का प्रदर्शन संबंधित जनजातियों के युवक-युवतियों द्वारा किया गया।

बस्तर की जनजातीय चित्रकला पर आधारित जीवंत प्रदर्शनी में आदिवासी जीवन, प्रकृति, लोक देवता, पर्व-त्योहार और दैनिक जीवन को सहज रंगों और प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, जो पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक धरोहर का सशक्त माध्यम है।

स्थानीय व्यंजन स्टॉल में जोंधरी लाई के लड्डू, जोंधरा, मंडिया पेज, आमट, चापड़ा चटनी, भेंडा चटनी, कुलथी दाल, पान बोबो, तीखुर सहित पारंपरिक खाद्य सामग्री और पेय पदार्थ लांदा व सल्फी का प्रदर्शन किया गया। वहीं लोकचित्रों की प्रदर्शनी में बस्तर की संस्कृति, इतिहास, प्राकृतिक सौंदर्य और लोकजीवन से जुड़ी तस्वीरों के साथ जनजातीय समाज पर आधारित साहित्य भी प्रदर्शित किया गया।

यह प्रदर्शनी बस्तर की समृद्ध जनजातीय विरासत, सृजनशीलता और सांस्कृतिक पहचान को एक सशक्त मंच प्रदान करती नजर आई , श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने जनजातीय परंपराओं, आदिम संस्कृति और बस्तर की विशिष्ट कला को समर्पित भव्य प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस दौरान उन्होंने विभिन्न स्टॉलों का भ्रमण कर स्थानीय कारीगरों, शिल्पकारों और कलाकारों से संवाद किया तथा प्रदर्शित कलाओं और उत्पादों की जानकारी प्राप्त की।

राष्ट्रपति ने बस्तर पंडुम को जनजातीय विरासत के संरक्षण और उसके वैश्विक प्रचार का प्रभावी मंच बताते हुए आयोजन की सराहना की। प्रदर्शनी में ढोकरा हस्तशिल्प, टेराकोटा, वुड कार्विंग, सीसल कला, बांस शिल्प, लौह शिल्प, जनजातीय वेश-भूषा एवं आभूषण, तुम्बा कला, जनजातीय चित्रकला, पारंपरिक व्यंजन तथा लोकचित्रों का आकर्षक प्रदर्शन किया गया।

जनजातीय हस्तशिल्प प्रदर्शनी में ढोकरा कला से निर्मित वस्तुएं विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। लॉस्ट वैक्स कास्टिंग तकनीक से तैयार यह प्राचीन धातु कला प्रकृति, देवी-देवताओं और ग्रामीण जीवन को अभिव्यक्त करती है। प्रत्येक ढोकरा कृति पूर्णतः हस्तनिर्मित होती है, जिसमें समाड़ी मिट्टी, मोम, तार, पीतल और पारंपरिक भट्टी का उपयोग किया जाता है। इसके साथ ही टेराकोटा कला के अंतर्गत मिट्टी से बनी आकृतियों ने लोक आस्था और ग्रामीण जीवन की सजीव झलक प्रस्तुत की।

लकड़ी की नक्काशी कला के स्टॉल में सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं पर आधारित मूर्तियां प्रदर्शित की गईं, जिनके निर्माण में सागौन, बीजा, सिवनर और साल लकड़ी का उपयोग किया गया है। सीसल कला से बने जूट वस्त्र और हस्तशिल्पों ने भी राष्ट्रपति का ध्यान आकर्षित किया। बांस से निर्मित उपयोगी एवं सजावटी वस्तुएं तथा गढ़े हुए लोहे से बनी कलाकृतियां जनजातीय शिल्प कौशल की उत्कृष्ट मिसाल रहीं।

जनजातीय आभूषणों के स्टॉल में चांदी, मोती, शंख और विभिन्न धातुओं से हाथ से बनाए गए आभूषण प्रदर्शित किए गए, जो आदिवासी समाज की पहचान और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतीक हैं। तुम्बा कला के अंतर्गत सूखी लौकी से बने पारंपरिक वाद्य यंत्र और सजावटी वस्तुएं भी प्रदर्शनी में शामिल रहीं।

जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण स्टॉल में बस्तर क्षेत्र की प्रमुख जनजातियां— दंडामी माढ़िया, अबूझमाड़िया, मुरिया, भतरा और हल्बा — की पारंपरिक वेशभूषा एवं आभूषणों का प्रदर्शन संबंधित जनजातियों के युवक-युवतियों द्वारा किया गया।

बस्तर की जनजातीय चित्रकला पर आधारित जीवंत प्रदर्शनी में आदिवासी जीवन, प्रकृति, लोक देवता, पर्व-त्योहार और दैनिक जीवन को सहज रंगों और प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, जो पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक धरोहर का सशक्त माध्यम है।

स्थानीय व्यंजन स्टॉल में जोंधरी लाई के लड्डू, जोंधरा, मंडिया पेज, आमट, चापड़ा चटनी, भेंडा चटनी, कुलथी दाल, पान बोबो, तीखुर सहित पारंपरिक खाद्य सामग्री और पेय पदार्थ लांदा व सल्फी का प्रदर्शन किया गया। वहीं लोकचित्रों की प्रदर्शनी में बस्तर की संस्कृति, इतिहास, प्राकृतिक सौंदर्य और लोकजीवन से जुड़ी तस्वीरों के साथ जनजातीय समाज पर आधारित साहित्य भी प्रदर्शित किया गया।

यह प्रदर्शनी बस्तर की समृद्ध जनजातीय विरासत, सृजनशीलता और सांस्कृतिक पहचान को एक सशक्त मंच प्रदान करती नजर आई।

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