जशपुर: बंजारा समाज ने परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ मनाई होली, अंगारों पर सात बार की परिक्रमा

जशपुर: देशभर में होली जहां रंगों और उल्लास का पर्व मानी जाती है, वहीं जशपुर के बंजारा समाज के लिए यह त्योहार आस्था, तपस्या और सदियों पुरानी परंपराओं का प्रतीक है। यहां होली केवल रंगों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कठिन धार्मिक अनुष्ठानों और सामुदायिक एकजुटता के साथ मनाई जाती है।

पूर्णिमा की रात समाज के मुखिया के चावड़ीघर, जिसे समुदाय का प्रमुख सामुदायिक भवन माना जाता है, से उत्सव की शुरुआत हुई। ढोलक और झांझ की थाप पर पूरी रात पारंपरिक फाग गीत गूंजते रहे। समाज के वरिष्ठ सदस्य मोती बंजारा ने बताया कि यह रतजगा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

ब्रह्म मुहूर्त में विधि-विधान के साथ होलिका दहन किया गया। बुजुर्ग उत्तम राम बंजारा के अनुसार, होलिका दहन के समय देवताओं और पितरों को तृप्त करने के लिए नई फसलों का अर्पण किया जाता है, जिससे इस पर्व का आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है।

होलिका दहन के बाद दूध और गंगाजल से अग्नि को शांत किया गया। इसके पश्चात समाज के लोगों ने होलिका की राख से एक-दूसरे को तिलक लगाया। बच्चों ने बड़ों से आशीर्वाद लिया और सभी ने पुरानी ईर्ष्या-द्वेष भुलाकर गले मिलकर आपसी सौहार्द का संदेश दिया।

शाम को उत्सव का सबसे अनोखा और रोमांचक दृश्य देखने को मिला। परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना के साथ पुरुषों और महिलाओं ने दहकते अंगारों पर नंगे पांव सात बार परिक्रमा की। मान्यता है कि होलिका की अग्नि पार करने से रोग, शोक और भय का नाश होता है तथा समाज में किसी प्रकार की अनहोनी नहीं होती।

बंजारा समाज में होली का यह उत्सव फाल्गुन पूर्णिमा से प्रारंभ होकर धूल पंचमी तक चलता है। आधुनिक समय में भी समाज अपने इन कठिन और विशिष्ट रीति-रिवाजों को पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभा रहा है, जो सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने का सशक्त उदाहरण है।

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