जशपुर, 12 जुलाई 2026। जशपुर जिले में ग्रामीण आजीविका और पारंपरिक हस्तशिल्प को नई पहचान दिलाने के लिए जिला प्रशासन लगातार नवाचार कर रहा है। इसी क्रम में जशक्राफ्ट ब्रांड को मजबूत बनाने और बांस हस्तशिल्प से जुड़े परिवारों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से विकासखंड जशपुर की ग्राम पंचायत झोलांगा में 29 जून से 29 जुलाई तक एक माह का आवासीय बांस हस्तशिल्प प्रशिक्षण आयोजित किया जा रहा है।
यह प्रशिक्षण कलेक्टर रोहित व्यास के नेतृत्व और मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत अभिषेक कुमार के मार्गदर्शन में जिला पंचायत जशपुर एवं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) द्वारा संचालित किया जा रहा है। कार्यक्रम के माध्यम से बांस हस्तशिल्प से जुड़े करीब 150 परिवारों की आजीविका सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखा गया है। वर्तमान में 46 महिलाओं का पहला बैच प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा है।
प्रशिक्षण की खास बात यह है कि प्रतिभागियों को आधुनिक मशीनों के उपयोग, नई डिजाइनों और बाजार की मांग के अनुरूप उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके लिए गुजरात के सूरत से अनुभवी विशेषज्ञों और प्रशिक्षकों को आमंत्रित किया गया है।
प्रशिक्षण में फैंसी ट्रे, गुलदस्ते, माचिया, सजावटी वस्तुएं, चटाई, आकर्षक टोकरियां, फर्नीचर, सोफा, पलंग सहित कई आधुनिक एवं उपयोगी बांस उत्पाद बनाना सिखाया जा रहा है, जिससे स्थानीय कारीगर राष्ट्रीय बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद तैयार कर सकें।
जशपुर और मनोरा विकासखंड में लगभग 250 परिवार वर्षों से बांस हस्तशिल्प के माध्यम से आजीविका चला रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या में बिहान स्व-सहायता समूहों की महिलाएं भी सक्रिय हैं। जिला प्रशासन इन समूहों को चक्रीय निधि, सामुदायिक निवेश निधि (CIF), बैंक लिंकेज और मुद्रा ऋण जैसी वित्तीय सुविधाओं से जोड़कर उनके उद्यमों को मजबूती प्रदान कर रहा है। साथ ही समय-समय पर कौशल उन्नयन और उद्यमिता विकास का प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया जा रहा है।
जशक्राफ्ट ब्रांड के तहत तैयार उत्पादों को रूरल मार्ट, राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियों तथा देश के विभिन्न बाजारों से जोड़ने के लिए डिजाइन और विपणन विशेषज्ञों की सेवाएं ली जा रही हैं, ताकि स्थानीय कारीगरों को उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य मिल सके।
जिला प्रशासन का लक्ष्य अगले वर्ष तक हस्तशिल्प से जुड़े सभी स्व-सहायता समूहों के सदस्यों को ‘लखपति दीदी’ की श्रेणी में लाना है। यह पहल पारंपरिक बांस शिल्प को आधुनिक बाजार से जोड़ने के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण, स्थानीय रोजगार सृजन, जनजातीय परिवारों की आय वृद्धि और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी।