नई दिल्ली: जनजातीय समाज दुनिया को सिखा सकता है प्रकृति संग विकास, दिल्ली के लाल किला मैदान में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का बड़ा संदेश

नई दिल्ली। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित राष्ट्रीय जनजाति सांस्कृतिक समागम जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक चेतना का विराट मंच बनकर उभरा। जनजाति सुरक्षा मंच एवं जनजाति जागृति समिति द्वारा आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में देशभर से हजारों जनजातीय प्रतिनिधि, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता और पारंपरिक समुदायों के सदस्य शामिल हुए। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि Vishnu Deo Sai की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष महत्व प्रदान किया।

लाल किले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में पारंपरिक वेशभूषा, लोक वाद्ययंत्रों और जनजातीय संस्कृति के विविध रंगों से सजा यह आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि देश की मूल सांस्कृतिक चेतना और जनजातीय पहचान के संरक्षण का राष्ट्रीय संदेश बनकर सामने आया।

अपने संबोधन में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति का रक्षक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का सबसे प्राचीन और जीवंत स्वरूप है। उन्होंने कहा कि सदियों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए जनजातीय समाज ने प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखा है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब जनजातीय जीवन दर्शन मानवता को टिकाऊ विकास का मार्ग दिखा सकता है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी समृद्ध जनजातीय संस्कृति से जुड़ी हुई है, जहां 42 प्रकार की जनजातियां निवास करती हैं और राज्य का लगभग 44 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राष्ट्र निर्माण तक जनजातीय समाज का योगदान अतुलनीय रहा है। भगवान Birsa Munda और छत्तीसगढ़ के अमर शहीद Veer Narayan Singh जैसे महानायकों ने अपनी संस्कृति, स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष और बलिदान का इतिहास रचा।

मुख्यमंत्री ने बताया कि उनकी सरकार जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और जीवन मूल्यों के संरक्षण के लिए निरंतर कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि ‘आदि परब’, बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन जनजातीय प्रतिभा, परंपरा और पहचान को राष्ट्रीय मंच प्रदान कर रहे हैं। साथ ही गोंडी, हल्बी और सादरी जैसी जनजातीय भाषाओं में प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा देकर नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। बस्तर से सरगुजा तक देवगुड़ी और मातागुड़ी जैसे पारंपरिक आस्था केंद्रों के संरक्षण एवं विकास के कार्य भी तेजी से किए जा रहे हैं।

अपने संबोधन में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े विषय पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि समाज के भीतर यह भावना लगातार प्रबल हो रही है कि जो लोग अपनी मूल जनजातीय परंपराओं, संस्कृति और धर्म को छोड़ चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर किए जाने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, ताकि आरक्षण और सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ उन समुदायों तक पहुंचे जो आज भी अपनी मूल पहचान और परंपराओं को संरक्षित किए हुए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मांग किसी समुदाय के विरोध में नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की अस्मिता, अधिकारों और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा की भावना से जुड़ी हुई है तथा इसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में उठाया जा रहा है।

समागम के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से आए जनजातीय कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य, लोक संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत की मनमोहक झलक प्रस्तुत की। मांदर, ढोल और पारंपरिक लोकधुनों से गूंजते लाल किला मैदान में यह आयोजन जनजातीय समाज की एकता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सशक्त राष्ट्रीय घोष बनकर उभरा।

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