रायपुर। छत्तीसगढ़ के पूर्व नक्सल प्रभावित और अब नक्सलमुक्त हो रहे क्षेत्रों में शिक्षा की एक नई सुबह दिखाई दे रही है। जिन गांवों में कभी बारूद की गंध और बंदूक की आवाजें सुनाई देती थीं, वहां अब स्कूलों की घंटियां बज रही हैं और बच्चे राष्ट्रगान के साथ अपने भविष्य की नई इबारत लिख रहे हैं। शिक्षक दिवस के अवसर पर बस्तर और आसपास के दूरस्थ अंचलों में आया यह बदलाव शांति, सुरक्षा और विकास की नई तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है।
5 सितंबर को देशभर में भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान शिक्षाविद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती शिक्षक दिवस के रूप में मनाई जाती है। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग और अन्य दूरस्थ क्षेत्रों में वर्षों से बंद पड़े स्कूलों का फिर से गुलजार होना शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ लोकतंत्र और शांति की वापसी का भी प्रतीक बन गया है।
दो दशक बाद फिर खुले स्कूल
राज्य सरकार की सुरक्षा, पुनर्वास और जनकल्याणकारी नीतियों तथा ‘नियद नेल्ला नार’ जैसी योजनाओं के प्रभाव से दक्षिण बस्तर के सुदूर क्षेत्रों में तेजी से बदलाव आया है। बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर जैसे जिलों में लगभग दो से ढाई दशकों से बंद पड़े 600 से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों को जिला प्रशासन एवं सुरक्षा बलों के सहयोग से पुनः संचालित किया गया है।
इनमें कई स्कूल भवन नक्सली हिंसा के दौरान क्षतिग्रस्त हो गए थे, जबकि कुछ भवनों का उपयोग सुरक्षा बलों के कैंप के रूप में किया गया था। अब इन भवनों को पुनः बच्चों के अनुकूल बनाकर शिक्षा की गतिविधियां शुरू की जा रही हैं।
दूरस्थ गांवों में वर्षों बाद स्कूल की घंटी बजना केवल पढ़ाई की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह उस क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूत होती जड़ों का संकेत भी है।
दुर्गम इलाकों में शिक्षकों का अदम्य साहस
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा की लौ को फिर से प्रज्वलित करने का सबसे बड़ा श्रेय उन शिक्षकों और स्थानीय शिक्षा कर्मियों को जाता है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का संकल्प नहीं छोड़ा।
दूरस्थ वनांचलों में शिक्षक स्थानीय भाषाओं और बोलियों के माध्यम से बच्चों से संवाद स्थापित कर रहे हैं। गोंडी, हलबी और डोरली जैसी स्थानीय बोलियों का उपयोग कर बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
शिक्षकों ने ग्रामीणों और लंबे समय तक भय के माहौल में रहने वाले अभिभावकों के बीच जाकर विश्वास कायम किया। इसका परिणाम यह हुआ कि कई गांवों के बच्चे एक बार फिर किताब, कॉपी और ब्लैकबोर्ड की दुनिया से जुड़ने लगे हैं।
अस्थायी स्कूलों में भी नहीं रुक रही पढ़ाई
बीजापुर के पीड़िया, गंपूर और तमोड़ी जैसे क्षेत्रों तथा सुकमा के कई अंदरूनी गांवों में वर्षों से बंद पड़े स्कूलों को दोबारा शुरू किया गया है। कई स्थानों पर नक्सली हिंसा में पक्के स्कूल भवन क्षतिग्रस्त या ध्वस्त हो चुके थे।
ऐसे क्षेत्रों में ग्रामीणों ने प्रशासन के साथ मिलकर बांस और तिरपाल से अस्थायी छप्पर तैयार किए, ताकि बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो। सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षा के प्रति ग्रामीणों और प्रशासन की यह प्रतिबद्धता एक नई उम्मीद जगा रही है।
स्थानीय भाषाओं की चुनौती और बच्चों में विश्वास पैदा करने के लिए स्थानीय शिक्षित युवाओं को शिक्षा दूत के रूप में भी जोड़ा गया है। ये युवा अपने ही गांव और क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
तकनीक और नवाचार से बदल रहा बस्तर का बचपन
पुनः संचालित हो रहे स्कूलों में अब शिक्षा को आधुनिक तकनीक से भी जोड़ा जा रहा है। राज्य शासन द्वारा दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यालयों में सुविधाएं बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
स्मार्ट क्लास और डिजिटल शिक्षा: कई वनांचल क्षेत्रों के स्कूलों में डिजिटल कंटेंट और टैबलेट के माध्यम से बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की पहल की गई है।
खेलकूद और न्योता भोजन: स्कूलों में मध्याह्न भोजन के साथ न्योता भोजन और खेल सामग्री की उपलब्धता से बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने में मदद मिल रही है।
सुरक्षित वातावरण: ‘नियद नेल्ला नार’ योजना के तहत सुरक्षा कैंपों के आसपास के गांवों तक विकास और मूलभूत सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं। इससे शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित वातावरण तैयार हुआ है।
शिक्षा की घंटी बनी शांति और बदलाव की आवाज
इस शिक्षक दिवस पर छत्तीसगढ़ उन शिक्षकों को विशेष रूप से नमन कर रहा है, जो राज्य के सबसे कठिन और दुर्गम इलाकों में शिक्षा की मशाल लेकर आगे बढ़ रहे हैं।
जहां कभी भय और हिंसा का माहौल था, वहां आज बच्चों के हाथों में किताबें हैं। जहां कभी बंदूक की आवाज गूंजती थी, वहां अब स्कूल की घंटी और बच्चों की आवाज सुनाई दे रही है।
नक्सलमुक्त होते क्षेत्रों में शिक्षा की यह नई शुरुआत इस बात का प्रमाण है कि विकास, विश्वास और शिक्षा किसी भी समाज को बदलने की सबसे बड़ी ताकत रखते हैं। बस्तर और छत्तीसगढ़ के दूरस्थ अंचलों में फिर से बजती स्कूल की घंटियां आने वाली पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य और स्थायी शांति की नई उम्मीद बनकर उभरी हैं।
— धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक जनसंपर्क